रुचिका कक्कड़
Research Assistant, Institute for Conflict Management
13 अगस्त 2026 को शिरोमणि अकाली दल (SAD) के अध्यक्ष और पंजाब के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल महाराष्ट्र के नांदेड स्थित गुरुद्वारा माता साहिब देवन जी मुगत परिसर में तलवार/किरपान से किए गए हमले में घायल हो गए। घटना लगभग दोपहर 1:45 से 2 बजे के बीच हुई। उस समय बादल अपनी पत्नी और SAD सांसद हरसिमरत कौर बादल तथा परिवार के अन्य सदस्यों के साथ तख्त श्री हजूर साहिब में मत्था टेकने के बाद सीढ़ियों से नीचे उतर रहे थे।
हमलावर की पहचान पुणे निवासी 60–65 वर्षीय जस्पाल सिंह उर्फ जस्पाल सिंह तेजासिंह ऐदल के रूप में हुई है। बताया जाता है कि वह हाथ जोड़कर सुखबीर बादल के पास आया और रूमाल अथवा इसी तरह के कपड़े में छिपाई गई किरपान से उनके सीने या धड़ पर वार करने का प्रयास किया। बादल ने अपने दाहिने हाथ से वार को रोक लिया, जिससे उनके हाथ में गंभीर चोट आई। कुछ रिपोर्टों में टेंडन, मांसपेशियों और नसों को नुकसान पहुंचने तथा फ्रैक्चर की भी बात कही गई है।

हमले के दौरान विशेष सुरक्षा इकाई (SPU) के पुलिस निरीक्षक संतोष केंद्रे भी घायल हो गए। उन्होंने तत्काल हस्तक्षेप करते हुए हमलावर को काबू कर लिया। हमलावर को मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया गया।
जस्पाल सिंह निहंग वेशभूषा में था और कथित तौर पर लगभग दो वर्षों से गुरुद्वारे में सेवा कर रहा था। इससे पहले वह हिंदुस्तान यूनिलीवर सहित अन्य संस्थानों में प्रबंधकीय पदों पर कार्य कर चुका था और उसके पास वाणिज्य तथा कानून की डिग्रियां भी थीं। हमले का वास्तविक मकसद अभी जांच के अधीन है। हालांकि, आरोपी ने कथित तौर पर पंजाब में SAD के पिछले शासनकाल के दौरान नशीली दवाओं की समस्या को लेकर गुस्सा होने की बात कही है। कुछ रिपोर्टों में उसके द्वारा “वाहेगुरु का आदेश” मिलने का दावा किए जाने का भी उल्लेख है। फिलहाल उसके किसी आपराधिक गिरोह से संबंध स्थापित नहीं हुए हैं।
यह दो वर्षों से भी कम समय में सुखबीर सिंह बादल पर हुआ दूसरा गंभीर हमला है। दिसंबर 2024 में पूर्व खालिस्तानी उग्रवादी नारायण सिंह चौरा ने अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर के बाहर सेवा कर रहे बादल पर गोली चलाने का प्रयास किया था। उस घटना में बादल बाल-बाल बच गए थे।
गिरती राजनीतिक ताकत
नांदेड का हमला ऐसे समय हुआ है जब सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व में SAD की लोकप्रियता और संगठनात्मक ताकत में लंबे समय से जारी गिरावट सामने है। कभी पंजाब की प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी और मध्यमार्गी पंथिक—अर्थात सिख धार्मिक-राजनीतिक हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली—शक्ति के रूप में स्थापित SAD को पिछले एक दशक में लगातार चुनावी झटकों का सामना करना पड़ा है।
2012 के पंजाब विधानसभा चुनाव में SAD ने 56 सीटें जीती थीं। लेकिन 2017 के चुनाव में पार्टी महज 15 सीटों पर सिमट गई और उसका वोट शेयर घटकर लगभग 25.2 प्रतिशत रह गया। 2022 के विधानसभा चुनाव में स्थिति और खराब हुई। पार्टी केवल तीन सीटें जीत सकी, जो उसके दशकों के राजनीतिक इतिहास में सबसे खराब प्रदर्शनों में से एक था। स्वयं सुखबीर सिंह बादल जलालाबाद सीट से चुनाव हार गए, जबकि आम आदमी पार्टी (AAP) ने 117 में से 92 सीटें जीतकर राज्य में भारी बहुमत हासिल किया। इस चुनाव में SAD का वोट शेयर भी घटकर लगभग 18.4 प्रतिशत रह गया।
2024 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी की गिरावट जारी रही। पंजाब की 13 लोकसभा सीटों में SAD केवल एक सीट जीत सकी, जिसे हरसिमरत कौर बादल ने बरकरार रखा। सुखबीर सिंह बादल ने उस चुनाव में स्वयं लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा।
बेअदबी संकट और पंथिक विश्वसनीयता का क्षरण
SAD की लोकप्रियता में गिरावट के पीछे कई परस्पर जुड़े राजनीतिक, सामाजिक और संगठनात्मक कारण रहे हैं। इनमें 2015 का बेअदबी संकट विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाओं, विशेषकर बरगाड़ी में हुई घटना, और उसके बाद बहबल कलां तथा कोटकपूरा में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस गोलीबारी ने तत्कालीन SAD-BJP सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। इन घटनाओं से निपटने, दोषियों की पहचान करने तथा न्याय और जवाबदेही सुनिश्चित करने में सरकार की कथित विफलता ने सिख समुदाय के एक बड़े वर्ग में असंतोष पैदा किया और SAD की विश्वसनीयता को गहरा नुकसान पहुंचाया।
इससे पहले 2007 में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख के गुरु गोबिंद सिंह जैसी पोशाक में सामने आने से जुड़ा विवाद भी सिख राजनीति में व्यापक प्रतिक्रिया का कारण बना था। कई वर्षों बाद अकाल तख्त द्वारा उन्हें दी गई संक्षिप्त माफी ने इस धारणा को और मजबूत किया कि धार्मिक संस्थानों पर राजनीतिक प्रभाव था। व्यापक जन-विरोध के बाद उस माफी को वापस लेना राजनीतिक हितों और पंथिक भावनाओं के बीच मौजूद तनाव को उजागर करता है।
इन घटनाओं ने SAD की पंथिक विश्वसनीयता को कमजोर किया। पार्टी पर लंबे समय से यह आरोप लगाया जाता रहा है कि बादल परिवार का शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) और अकाल तख्त जैसी सिख धार्मिक संस्थाओं पर अत्यधिक प्रभाव रहा है। आलोचकों के अनुसार, SAD समय के साथ अपनी पारंपरिक वैचारिक और पंथिक प्राथमिकताओं से दूर होती गई और व्यावहारिक सत्ता-राजनीति, संरक्षणवाद तथा केंद्रीकृत नेतृत्व पर अधिक निर्भर हो गई।
पार्टी के भीतर रिश्तेदारों, कारोबारियों और अन्य गैर-पारंपरिक राजनीतिक चेहरों की बढ़ती भूमिका ने भी पारंपरिक अकाली कार्यकर्ताओं के एक वर्ग में असंतोष पैदा किया।
धार्मिक जवाबदेही और आंतरिक विद्रोह
SAD के संकट को 2024 में एक और बड़ा झटका लगा, जब अकाल तख्त ने 2007 से 2017 के बीच लिए गए कुछ निर्णयों के लिए, जिन्हें सिख हितों के लिए नुकसानदायक माना गया, सुखबीर सिंह बादल को तनखैया घोषित किया। इसका अर्थ धार्मिक कदाचार का दोषी व्यक्ति है।
बादल और पार्टी के अन्य नेताओं ने सार्वजनिक रूप से धार्मिक प्रायश्चित किया, लेकिन इससे पार्टी की राजनीतिक और धार्मिक विश्वसनीयता तत्काल बहाल नहीं हो सकी। इसी अवधि में पार्टी के भीतर असंतोष, अलग-अलग गुटों का उभरना और नेतृत्व परिवर्तन की मांगें भी तेज होती गईं।
इस प्रकार SAD का संकट केवल चुनावी हार तक सीमित नहीं रहा। पार्टी की संगठनात्मक एकजुटता, नेतृत्व की स्वीकार्यता और पंथिक वैधता—तीनों एक साथ कमजोर हुए।
BJP के साथ गठबंधन की राजनीतिक कीमत
SAD की गिरती लोकप्रियता में गठबंधन राजनीति ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ लंबे समय तक चला गठबंधन SAD को कई वर्षों तक पंजाब की सत्ता में बनाए रखने में महत्वपूर्ण रहा। लेकिन समय के साथ उसके पारंपरिक मतदाताओं के एक वर्ग में इस गठबंधन की राजनीतिक कीमत भी महसूस की जाने लगी।

संघवाद, कृषि, सिख हितों और पंजाब के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर SAD की स्थिति को लेकर सवाल उठे। विशेष रूप से 2020 के कृषि कानूनों के मुद्दे पर पार्टी के शुरुआती रुख की आलोचना हुई। बाद में किसान आंदोलन के बीच SAD ने BJP के साथ अपना गठबंधन समाप्त कर दिया। हालांकि, तब तक दोनों दलों के बीच लंबे राजनीतिक संबंधों को लेकर पार्टी के पारंपरिक समर्थन आधार में असमंजस पैदा हो चुका था।
नशीली दवाओं का मुद्दा और शासन की छवि
पंजाब में नशीली दवाओं का संकट भी SAD की राजनीतिक छवि के लिए एक गंभीर चुनौती रहा है। राज्य में नशीले पदार्थों के व्यापार से जुड़े राजनीतिक और आपराधिक नेटवर्क के आरोपों ने लगातार सरकारों को घेरा है। SAD के विरोधियों ने लंबे समय से राज्य में नशीली दवाओं की समस्या के विस्तार को अकाली शासन के दौर से जोड़कर देखा है।
बादल परिवार के सदस्यों से जुड़े विवादों ने भी इस राजनीतिक बहस को और तीखा किया। हालांकि इन आरोपों और राजनीतिक दावों के अलग-अलग मामलों में अलग-अलग कानूनी और तथ्यात्मक आधार हैं, लेकिन सार्वजनिक धारणा के स्तर पर इनका प्रभाव SAD के लिए नुकसानदायक रहा।
पंजाब में नशीली दवाओं की समस्या आज भी राजनीतिक बहस का एक महत्वपूर्ण विषय है। लगातार आने वाली सरकारों पर संगठित तस्करी नेटवर्क को खत्म करने में विफल रहने के आरोप लगते रहे हैं। SAD के मामले में यह मुद्दा विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा, क्योंकि पार्टी की सत्ता में लंबे समय तक मौजूदगी ने उसे शासन और जवाबदेही से जुड़े सवालों के केंद्र में ला दिया।
नेतृत्व संकट और भविष्य की चुनौती
इन सभी घटनाक्रमों ने SAD के लिए राजनीतिक और संगठनात्मक गिरावट का एक आत्म-प्रबलित चक्र बना दिया है। चुनावी कमजोरी से संगठन कमजोर हुआ; संगठनात्मक कमजोरी ने नेतृत्व के प्रति असंतोष बढ़ाया; और नेतृत्व तथा पंथिक विश्वसनीयता के संकट ने पार्टी के पारंपरिक समर्थन आधार को और सीमित कर दिया।
नांदेड हमला इसी व्यापक संकट की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। यह कहना उचित नहीं होगा कि हमला स्वयं SAD के राजनीतिक पतन का कारण है। बल्कि यह उस अस्थिर राजनीतिक वातावरण का एक और गंभीर संकेत है, जिसमें पार्टी और उसके शीर्ष नेतृत्व को लगातार चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
SAD के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती केवल चुनाव जीतना नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक विश्वसनीयता को पुनर्स्थापित करना है। इसके लिए पार्टी को बादल परिवार के इर्द-गिर्द केंद्रित नेतृत्व संरचना पर पुनर्विचार करना होगा और संगठन में व्यापक स्तर पर लोकतांत्रिक तथा पीढ़ीगत बदलाव लाने होंगे। उसे ऐसी समकालीन नीतियां भी विकसित करनी होंगी जो पारंपरिक पंथिक पहचान की राजनीति से आगे बढ़कर रोजगार, कृषि, नशीली दवाओं, संघवाद, युवाओं के भविष्य और पंजाब की आर्थिक चुनौतियों जैसे मुद्दों को संबोधित करें।
केवल BJP के साथ गठबंधन करना या केवल पंथिक मुद्दों के आधार पर नए सिरे से लामबंदी करना पार्टी की गिरती राजनीतिक स्थिति को पलटने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। SAD को अपने पारंपरिक मतदाताओं के बीच विश्वास पुनः अर्जित करने के साथ-साथ उन नए सामाजिक और राजनीतिक समूहों तक भी पहुंच बनानी होगी, जो पिछले वर्षों में उससे दूर हो चुके हैं।
इस दृष्टि से नांदेड हमला केवल एक सुरक्षा घटना नहीं है। यह उस व्यापक राजनीतिक संकट का एक लक्षण है, जिसका सामना शिरोमणि अकाली दल लंबे समय से कर रहा है। पार्टी का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह इस संकट को केवल नेतृत्व की सुरक्षा या चुनावी रणनीति के प्रश्न के रूप में देखती है, या फिर इसे अपनी राजनीति, संगठन और नेतृत्व मॉडल के व्यापक पुनर्गठन के अवसर के रूप में स्वीकार करती है।

