ढाका/कॉक्स बाजारबांग्लादेश के कॉक्स बाजार स्थित रोहिंग्या शरणार्थी शिविर अब केवल मानवीय संकट का प्रतीक नहीं रह गए हैं, बल्कि तेजी से उभरते सशस्त्र गुटों, आपराधिक नेटवर्क और कट्टरपंथी गतिविधियों के केंद्र बनते जा रहे हैं। हाल के महीनों में शिविरों के भीतर हुई हत्याओं, गोलीबारी और आतंकी संगठनों से जुड़े आरोपों ने क्षेत्रीय सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है।
बांग्लादेश के कॉक्स बाजार स्थित रोहिंग्या शरणार्थी शिविर अब केवल मानवीय संकट का प्रतीक नहीं रह गए हैं, बल्कि तेजी से उभरते सशस्त्र गुटों, आपराधिक नेटवर्क और कट्टरपंथी गतिविधियों के केंद्र बनते जा रहे हैं। हाल के महीनों में शिविरों के भीतर हुई हत्याओं, गोलीबारी और आतंकी संगठनों से जुड़े आरोपों ने क्षेत्रीय सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है।
मई 2026 के दौरान कॉक्स बाजार के विभिन्न रोहिंग्या शिविरों में कई हिंसक घटनाएं सामने आईं। शिविरों में सक्रिय अराकान रोहिंग्या साल्वेशन आर्मी (ARSA), अराकान रोहिंग्या आर्मी (ARA), अराकान रोहिंग्या ऑर्गनाइजेशन (ARO), सद्दाम बहिनी और जाकिर बहिनी जैसे गुटों के बीच प्रभुत्व की लड़ाई लगातार खूनी रूप ले रही है।
14 मई को टेकनाफ के नयापारा शिविर में जाकिर बहिनी के सदस्य हसन अहमद की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इससे दो दिन पहले बालुखाली कैंप-8 में दो प्रतिद्वंद्वी रोहिंग्या गुटों के बीच हुई झड़प में एक युवक गंभीर रूप से घायल हो गया था। वहीं 6 मई को ARA प्रमुख नबी होसैन के भाई मोहम्मद कमाल की हत्या कर दी गई, जबकि 5 मई को ARO के कमांडर केफायत उल्लाह हलीम भी गोलीबारी में मारे गए।
विशेषज्ञों का मानना है कि ये घटनाएं केवल आपसी गैंगवार नहीं, बल्कि शिविरों के भीतर समानांतर सत्ता संरचना स्थापित करने की लड़ाई का हिस्सा हैं। शिविर प्रशासन, मस्जिद समितियों, भर्ती नेटवर्क और अवैध मादक पदार्थों के कारोबार पर नियंत्रण के लिए सशस्त्र गुटों के बीच संघर्ष लगातार तेज हो रहा है।
स्थिति को और गंभीर बनाते हुए बांग्लादेशी सुरक्षा एजेंसियों ने हाल के महीनों में कई रोहिंग्या युवकों को पाकिस्तान के प्रतिबंधित आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) से कथित संबंधों के आरोप में गिरफ्तार किया है। जांच में सोशल मीडिया और व्हाट्सएप समूहों के माध्यम से कट्टरपंथी विचारधारा के प्रसार के संकेत मिले हैं। हालांकि अब तक शिविरों में TTP की प्रत्यक्ष संगठनात्मक मौजूदगी साबित नहीं हुई है, लेकिन डिजिटल नेटवर्किंग और ऑनलाइन कट्टरकरण को सुरक्षा एजेंसियां गंभीर खतरे के रूप में देख रही हैं।
इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट (ICM) के आंकड़ों के अनुसार, 2026 में अब तक रोहिंग्या उग्रवाद से जुड़ी घटनाओं में कम से कम चार लोगों की मौत और तीन लोग घायल हुए हैं। इसके अलावा 14 लोगों को विभिन्न मामलों में गिरफ्तार किया गया है। वर्ष 2025 में ऐसी घटनाओं में 37 लोगों की जान गई थी, जबकि 2024 में मृतकों की संख्या 42 और 2023 में 95 तक पहुंच गई थी।
उधर म्यांमार के राखाइन राज्य में जारी संघर्ष भी संकट को और जटिल बना रहा है। मानवाधिकार संगठनों ने अराकान आर्मी (AA) पर रोहिंग्या नागरिकों के खिलाफ गंभीर अत्याचारों के आरोप लगाए हैं। सीमा क्षेत्रों में बारूदी सुरंगों, अपहरण और गोलीबारी की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, जिनका असर बांग्लादेश में शरण लिए रोहिंग्याओं पर भी पड़ रहा है।
बॉर्डर गार्ड बांग्लादेश (BGB) के अनुसार, दिसंबर 2024 से मई 2026 तक अराकान आर्मी ने 165 मछुआरों को हिरासत में लिया, जबकि 234 लोगों को वापस लाने में सफलता मिली। सीमा पर बिछाई गई बारूदी सुरंगों के कारण कई रोहिंग्या घायल भी हुए हैं।
इस बीच संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (UNHCR) के आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2026 तक बांग्लादेश में पंजीकृत रोहिंग्या शरणार्थियों की संख्या लगभग 11.94 लाख तक पहुंच चुकी है। दिसंबर 2024 के बाद से करीब डेढ़ लाख नए रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश पहुंचे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि रोहिंग्या संकट अब केवल शरणार्थियों के पुनर्वास का मुद्दा नहीं रह गया है। शिविरों में बढ़ती हथियारबंद गतिविधियां, अंतरराष्ट्रीय आतंकी नेटवर्क से संभावित संपर्क, अवैध तस्करी और म्यांमार में जारी संघर्ष इसे दक्षिण एशिया की एक बड़ी सुरक्षा चुनौती में बदल रहे हैं। बांग्लादेश के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती मानवीय दायित्वों और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की है।

