बोले- भावनाओं में बहने के बजाय समझदारी, धैर्य और संयम से काम लें, समाज सुधार की शुरुआत घर से हो
अब्दुल गनी खान| भिवंडी
दारुल उलूम दीनियात के तत्वावधान में मासिक जलसा-ए-इस्लाह-ए-मआशरा का आयोजन नमाज-ए-ईशा के बाद किया गया। कार्यक्रम में पुरुषों के साथ बड़ी संख्या में महिलाओं ने भी हिस्सा लिया। जलसे को प्रमुख धर्मगुरु हजरत मौलाना रईस अहमद नदवी ने संबोधित किया।
मौलाना रईस अहमद नदवी ने ‘भारत के मौजूदा हालात, मुसलमानों की जिम्मेदारियां और परिस्थितियों के मद्देनजर हमारा रवैया क्या होना चाहिए’ विषय पर विचार रखते हुए कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में भावनाओं में बहने के बजाय समझदारी, दूरदर्शिता, धैर्य और संयम से काम लेने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि परिस्थितियां कितनी भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों, धार्मिक और नैतिक मूल्यों से जुड़े रहते हुए समाज में सकारात्मक और रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए।
समाज सुधार की शुरुआत खुद से करने की अपील
मौलाना ने कहा कि समाज सुधार की शुरुआत दूसरों से नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी, घर और परिवार से होनी चाहिए। माता-पिता बच्चों की धार्मिक और नैतिक शिक्षा पर विशेष ध्यान दें। वहीं युवाओं को शिक्षा के साथ अच्छे चरित्र और संस्कारों को भी अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपने व्यवहार और कार्यों के जरिए समाज में शांति, प्रेम, भाईचारे और आपसी सम्मान को बढ़ावा देने का प्रयास करे।
कानून और संविधान का सम्मान करने पर जोर
मौलाना रईस अहमद नदवी ने मुसलमानों से कानून का पालन करने और देश के संविधान एवं व्यवस्था का सम्मान करने की अपील की। उन्होंने कहा कि अपने जायज अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण, कानूनी और समझदारीपूर्ण तरीके को अपनाया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों वाला देश है। यहां अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोग रहते हैं। ऐसे में सभी नागरिकों की जिम्मेदारी है कि वे आपसी सम्मान, सहिष्णुता, शांति और भाईचारे को मजबूत करें।
महिलाओं की भूमिका को बताया अहम
मौलाना ने कहा कि मुसलमान अपने बेहतर आचरण, ईमानदारी, मानव सेवा और सकारात्मक भूमिका के माध्यम से देश और समाज के विकास में प्रभावी योगदान दे सकते हैं। महिलाओं की भूमिका पर उन्होंने कहा कि परिवार की तरबियत और नई पीढ़ी के चरित्र निर्माण में महिलाओं की अहम जिम्मेदारी है।

उन्होंने कहा कि अच्छे संस्कारों वाले मजबूत परिवार से ही बेहतर, मजबूत और शांतिपूर्ण समाज की नींव रखी जा सकती है। जलसे में बड़ी संख्या में महिलाओं की मौजूदगी रही।

