17 साल बाद सुप्रीम कोर्ट का फैसला, भिवंडी मनपा को कचरा ठेकेदार को देने होंगे 15 करोड़

भिवंडी

देरी से भुगतान पर 9% ब्याज भी देना होगा, आर्थिक संकट से जूझ रही मनपा पर बढ़ा वित्तीय बोझ

भिवंडी: कचरा उठाने का ठेका रद्द किए जाने के 17 साल बाद भिवंडी निजामपुर शहर महानगरपालिका को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने कचरा उठाने वाली कंपनी एंथनी वेस्ट हैंडलिंग सेल प्रा. लि. को 15 करोड़ रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है। मनपा को यह राशि तीन महीने के भीतर चुकानी होगी। निर्धारित समय में भुगतान नहीं करने पर समझौते की मूल तारीख से 9 फीसदी वार्षिक ब्याज भी देना होगा। पहले से ही कर्ज और आर्थिक तंगी से जूझ रही मनपा के लिए यह फैसला बड़ी वित्तीय चुनौती माना जा रहा है।

  2009 में समय से पहले रद्द हुआ था ठेका

मनपा ने शहर में घर-घर कचरा संग्रहण, डंपिंग ग्राउंड तक कचरे के परिवहन और कंपोस्ट-ऊर्जा संयंत्र लगाने के लिए 15 अक्टूबर 2005 को एंथनी वेस्ट हैंडलिंग कंपनी को 10 साल का ठेका दिया था। इसके लिए कंपनी को सालाना 7 करोड़ 42 लाख 20 हजार रुपये का भुगतान किया जाना था। अनुबंध के तहत कंपनी को अपने वाहनों और मशीनरी का इस्तेमाल करना था।

हालांकि, कंपनी के कामकाज को लेकर नगरसेवकों, जनप्रतिनिधियों और नागरिकों की शिकायतें बढ़ती गईं। इसके बाद 21 फरवरी 2009 को मनपा महासभा में प्रस्ताव पारित कर ठेका अवधि पूरी होने से पहले ही समाप्त कर दिया गया।

  6.56 करोड़ के दावे से शुरू हुआ विवाद

ठेका रद्द होने के बाद कंपनी ने मनपा से 4 करोड़ 27 लाख रुपये के बकाया बिल और वाहन-मशीनरी के 2 करोड़ 29 लाख रुपये की मांग की। 16 फीसदी ब्याज जोड़कर कंपनी ने कुल 6 करोड़ 56 लाख रुपये का दावा किया और मामला हाई कोर्ट तक पहुंच गया।

हाई कोर्ट के निर्देश पर 16 सितंबर 2019 को एकल मध्यस्थ ए.पी. देशपांडे के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। कंपनी ने शुरुआत में 15 करोड़ 46 लाख रुपये का दावा किया था। बाद में 46 लाख रुपये छोड़कर 15 करोड़ रुपये में समझौता करने पर सहमति बनी। 18 फरवरी 2020 को मनपा की स्थायी समिति ने इस समझौते को मंजूरी दे दी।

   तत्कालीन आयुक्त ने दी थी चुनौती

स्थायी समिति की मंजूरी के बाद मनपा के तत्कालीन आयुक्त आईएएस पंकज आशिया ने इस फैसले का विरोध करते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की। हालांकि, 30 जुलाई 2020 को हाई कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि स्थायी समिति आयुक्त की वरिष्ठ प्राधिकारी है और समझौते के अनुसार भुगतान किया जाना चाहिए।

इसके बाद तत्कालीन आयुक्त ने हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। करीब छह साल चली कानूनी प्रक्रिया के बाद 5 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और मनपा को तीन महीने के भीतर 15 करोड़ रुपये का भुगतान करने का अंतिम आदेश दिया।

समय पर भुगतान नहीं किया तो बढ़ेगी रकम

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि तय समय में भुगतान नहीं करने पर समझौते की मूल तारीख से 9 फीसदी सालाना ब्याज भी देना होगा। ऐसे में भुगतान में देरी होने पर मनपा पर वित्तीय बोझ और बढ़ सकता है।

मनपा के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कोर्ट के आदेश का पालन करना अनिवार्य है। बजट में 15 करोड़ रुपये के इस भुगतान का प्रावधान नहीं है। राशि की व्यवस्था के लिए वित्तीय विकल्पों और फंड जुटाने के उपायों पर विचार किया जा रहा है।

जानकारों के मुताबिक, विवाद को समय रहते सुलझाने के बजाय वर्षों तक चली कानूनी प्रक्रिया का सीधा असर अब मनपा की आर्थिक स्थिति पर पड़ रहा है। पहले से वित्तीय संकट से जूझ रही मनपा के सामने 15 करोड़ रुपये की एकमुश्त देनदारी जुटाना बड़ी चुनौती होगी।

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