गणेशोत्सव के लिए नाशिक-सिन्नर के पाट-चौरंग विक्रेता भिवंडी पहुंचे, पिछले साल के मुकाबले 100 रुपये तक बढ़े दाम
गणेशोत्सव नजदीक आते ही भिवंडी के बाजारों में गणपति बाप्पा के स्वागत की तैयारियां तेज हो गई हैं। शहर में लकड़ी के पाट, चौरंग और पोलपाट की दुकानें सजने लगी हैं। हालांकि, इस बार महंगाई के साथ-साथ ऑनलाइन शॉपिंग का बढ़ता चलन पारंपरिक कारीगरों के कारोबार पर भारी पड़ रहा है।

हर साल की तरह इस वर्ष भी नाशिक-सिन्नर से पाट-चौरंग बनाने और बेचने वाले कारीगर भिवंडी पहुंचे हैं। शहर के मध्यवर्ती इलाके में आईजीएम उपजिला अस्पताल के पास उड़ानपुल के नीचे उन्होंने दुकानें लगाई हैं। रंग-बिरंगे पाट और आकर्षक नक्काशी वाले चौरंग राहगीरों और गणेश भक्तों का ध्यान खींच रहे हैं।
पेट्रोल डीजल की बढ़ती कीमतों के कारण आने जाने का बढ़ा खर्ज
कारीगरों का कहना है कि पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के कारण भिवंडी तक माल लाने और आने-जाने का खर्च बढ़ गया है। इसका सीधा असर पाट-चौरंग की कीमतों पर पड़ा है। विक्रेताओं के मुताबिक, पिछले साल करीब 150 रुपये में मिलने वाला गणपति का पाट अब 250 रुपये से शुरू हो रहा है। डिजाइन और लकड़ी की गुणवत्ता के आधार पर इसकी कीमत 500 से 700 रुपये तक पहुंच गई है।
वहीं, चौरंग की कीमत पिछले साल 200 रुपये के आसपास थी, जो अब बढ़कर करीब 250 रुपये हो गई है। छोटे पाट 50 से 80 रुपये और पोलपाट 200 से 250 रुपये तक बिक रहे हैं।
ऑनलाइन खरीदारी से पारंपरिक कारोबार प्रभावित
विक्रेताओं के मुताबिक बाजार में ग्राहक पहुंच रहे हैं, लेकिन बढ़ी कीमतों को लेकर मोलभाव भी कर रहे हैं। दूसरी ओर ऑनलाइन बाजार में घर बैठे सामान उपलब्ध होने से पारंपरिक दुकानदारों और कारीगरों की बिक्री पर असर पड़ा है।
पाट-चौरंग विक्रेता अमित पवार ने बताया कि ऑनलाइन खरीदारी के बढ़ते चलन के कारण ग्राहकों का एक वर्ग अब बाजार में आने के बजाय मोबाइल से ही सामान मंगवा लेता है। इससे वर्षों से पारंपरिक तरीके से यह कारोबार करने वाले कारीगरों की बिक्री प्रभावित हुई है।
सरकार से प्रोत्साहन की मांग
कारीगरों का कहना है कि लकड़ी के पारंपरिक पाट और चौरंग बनाने का काम कई परिवारों की आजीविका का साधन है। बढ़ती लागत और ऑनलाइन बाजार की चुनौती के बीच इस पारंपरिक व्यवसाय को बचाए रखने के लिए सरकार को कारीगरों के लिए विशेष प्रोत्साहन और सहायता योजनाएं शुरू करनी चाहिए।

