विशेष संवाददाता
कोलकाता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर अपनी स्पष्ट राय रखते हुए कहा है कि ऐसे रिश्तों में रहने वाले लोग प्रायः जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं होते। उन्होंने कहा कि परिवार और विवाह केवल शारीरिक संतुष्टि का साधन नहीं हैं, बल्कि यह समाज की एक महत्वपूर्ण और आधारभूत इकाई है।
रविवार को कोलकाता में आयोजित आरएसएस के एक कार्यक्रम में संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि परिवार वह पहली जगह है, जहां व्यक्ति समाज में रहना सीखता है। व्यक्ति के संस्कार, मूल्य और सामाजिक व्यवहार की नींव परिवार से ही पड़ती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि समाज की स्थिरता और संतुलन के लिए मजबूत पारिवारिक व्यवस्था आवश्यक है।
परिवार और जनसंख्या से जुड़े विषय पर बोलते हुए सरसंघचालक ने कहा कि बच्चों की संख्या या विवाह की उम्र को लेकर कोई तयशुदा फॉर्मूला नहीं हो सकता, क्योंकि यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि विभिन्न शोधों से संकेत मिलता है कि तीन बच्चे आदर्श हो सकते हैं, जबकि विवाह की उपयुक्त उम्र 19 से 25 वर्ष के बीच मानी जा सकती है।
मोहन भागवत के इस बयान को सामाजिक मूल्यों, पारिवारिक व्यवस्था और बदलते जीवनशैली के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनके वक्तव्य ने लिव-इन रिलेशनशिप, विवाह और परिवार की भूमिका को लेकर एक नई बहस को जन्म दिया है।

