सुरेश महाराज बरेली (उप्र)।
उत्तर प्रदेश के बरेली ज़िले के मोहम्मदगंज गांव में हुई हालिया पुलिस कार्रवाई ने एक बार फिर संविधान, कानून और उसके समान प्रयोग को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है। यह मामला केवल 12 लोगों की हिरासत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाता है कि क्या कानून सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू हो रहा है।
जानकारी के अनुसार, गांव के एक खाली मकान में कुछ लोग पिछले कई जुम्मों से सामूहिक नमाज़ अदा कर रहे थे। ग्रामीणों की सूचना पर पुलिस ने मौके पर पहुंचकर दबिश दी और वहां मौजूद 12 लोगों को हिरासत में ले लिया। उल्लेखनीय है कि इस पूरे घटनाक्रम में न तो किसी संगीन अपराध की प्राथमिकी दर्ज की गई, न ही किसी हिंसा, अवैध गतिविधि या कानून-व्यवस्था बिगाड़ने का कोई ठोस आरोप सामने आया।
पुलिस कार्रवाई का आधार बताया गया कि नमाज़ के लिए लिखित अनुमति नहीं ली गई थी और शांति भंग होने की आशंका थी। इसी आधार पर दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 107/151 के तहत चालान किया गया। ये धाराएं निवारक प्रकृति की हैं, जिनका उद्देश्य संभावित विवाद को टालना होता है, न कि किसी अपराध को सिद्ध करना।
संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। यह स्वतंत्रता तब तक संरक्षित है, जब तक धार्मिक गतिविधि से सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य को वास्तविक खतरा न हो। ऐसे में सवाल उठता है कि निजी मकान में सीमित लोगों द्वारा की जा रही नमाज़ से सार्वजनिक व्यवस्था को ऐसा कौन-सा खतरा उत्पन्न हो गया, जो सीधे हिरासत और चालान का कारण बना।
कानूनी दृष्टि से भी यह कार्रवाई कई सवाल खड़े करती है। CrPC की धारा 151 के तहत गिरफ्तारी तभी की जा सकती है, जब पुलिस को यह ठोस आशंका हो कि कोई व्यक्ति संज्ञेय अपराध करने वाला है। यहां न तो कोई संज्ञेय अपराध सामने आया और न ही किसी तरह की हिंसक स्थिति बनी। धारा 107 का उद्देश्य भी लोगों को समझाइश देकर शांति बनाए रखना होता है, न कि धार्मिक गतिविधि को अपराध के रूप में प्रस्तुत करना।
इस मामले में तुलना स्वतः सामने आती है। देश के अनेक हिस्सों में घरों और मोहल्लों में जागरण, भजन-कीर्तन, अखंड पाठ और प्रार्थना सभाएं कई-कई दिनों तक आयोजित होती हैं। लाउडस्पीकर, रातभर की भीड़ और सार्वजनिक आवागमन में बाधा के बावजूद प्रशासन अक्सर इसे धार्मिक आस्था का विषय मानकर नजरअंदाज करता रहा है। यदि कानून सबके लिए समान है, तो फिर नमाज़ के मामले में अलग मापदंड क्यों अपनाया गया?
बरेली की यह घटना यह स्पष्ट करती है कि समस्या कानून की नहीं, बल्कि उसके चयनात्मक प्रयोग की है। जब एक समुदाय की धार्मिक गतिविधि को संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण मिलता है और दूसरे की वही गतिविधि “शांति भंग” की आशंका बन जाती है, तो यह संविधान की आत्मा के साथ अन्याय है।
भारत एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य है, जहां राज्य का कर्तव्य सभी धर्मों के प्रति समान दूरी और समान न्याय सुनिश्चित करना है। मोहम्मदगंज की यह घटना प्रशासन से यह सवाल पूछती है कि क्या हम वास्तव में कानून के राज में जी रहे हैं, या फिर धार्मिक पहचान के आधार पर नियम बदल जाते हैं। जब तक संविधान और कानून की व्याख्या सबके लिए एक जैसी नहीं होगी, तब तक “एक देश, दो नियम” का आरोप यूं ही गूंजता रहेगा।

