अब्दुल गनी खान
भिवंडी: भिवंडी महानगरपालिका चुनाव में जीतकर जनप्रतिनिधि बनी कई महिलाओं को अब घर के अंदर ही दबाव और दखलअंदाजी का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय स्तर पर ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं कि चुनाव जीतने के बाद महिला पार्षदों की जगह उनके पति या परिवार के अन्य सदस्य ही अधिकारों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि चुनाव में जीतकर आईं कई महिला प्रतिनिधियों की जगह उनके घर के पुरुष सदस्य अधिकारियों और कर्मचारियों पर रौब झाड़ते नजर आते हैं। कुछ मामलों में तो मोहल्लों में भी परिवार के लोग खुद को “पार्षद प्रतिनिधि” बताकर लोगों पर दबाव बनाते देखे जा रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक, कई महिला पार्षदों को निर्णय लेने की पूरी स्वतंत्रता नहीं मिल रही है। उनके नाम से फाइलों पर हस्ताक्षर करवाए जाते हैं, जबकि बैठकों में या प्रशासनिक कार्यों में उनके पति या अन्य रिश्तेदार सक्रिय रहते हैं। इससे महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य पर भी सवाल उठने लगे हैं।
सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि स्थानीय निकाय चुनावों में महिलाओं को आरक्षण मिलने का उद्देश्य उन्हें राजनीति में आगे लाना और निर्णय प्रक्रिया में उनकी भागीदारी बढ़ाना था। लेकिन यदि उनके अधिकारों का इस्तेमाल परिवार के सदस्य करेंगे, तो यह आरक्षण की मूल भावना के साथ अन्याय होगा।
शहर के कुछ नागरिकों ने प्रशासन से मांग की है कि महिला जनप्रतिनिधियों को स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर दिया जाए और किसी भी प्रकार के दबाव या हस्तक्षेप पर रोक लगाई जाए। साथ ही, यदि किसी महिला पार्षद पर घरेलू या राजनीतिक दबाव बनाया जा रहा है तो उसकी जांच कर उचित कार्रवाई की जानी चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि महिला प्रतिनिधियों को प्रशिक्षण, कानूनी जानकारी और प्रशासनिक सहयोग दिया जाए ताकि वे बिना किसी दबाव के अपने दायित्वों का निर्वहन कर सकें। इससे न केवल लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत होगी, बल्कि महिलाओं की वास्तविक भागीदारी भी सुनिश्चित हो सकेगी।

