भिवंडी: महाराष्ट्र में ऑटो और टैक्सी चालकों के लिए मराठी अनिवार्य करने के फैसले पर सियासत गरमा गई है। भिवंडी पूर्व के विधायक रईस शेख ने साफ कहा है कि भाषा का सम्मान जरूरी है, लेकिन उसे लागू करने से पहले लोगों को सिखाने की व्यवस्था भी होनी चाहिए। गुरुवार को नगर निगम में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने यह बात कही।

विधायक शेख ने कहा कि महाराष्ट्र में मराठी बोलने की अपेक्षा स्वाभाविक है और उनकी पार्टी भी इसका समर्थन करती है, लेकिन बिना तैयारी के नियम थोपना सही नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि ऑटो चालकों के लिए विशेष प्रशिक्षण और सांस्कृतिक केंद्र बनाए जाएं, जहां उन्हें मराठी सिखाई जा सके। साथ ही, कम से कम 6 महीने का समय दिया जाए और समयसीमा की सख्ती में ढील दी जाए। उन्होंने बताया कि इस संबंध में परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक से भी मांग की गई है।
उन्होंने आगे कहा कि यदि उचित तैयारी और प्रशिक्षण के बाद यह नियम लागू किया जाता है, तो इससे बेहतर परिणाम मिलेंगे और किसी वर्ग के साथ अन्याय भी नहीं होगा।

वहीं, इस मुद्दे पर उत्तर भारतीय संघर्ष समिति के अब्दुल गनी खान ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि प्रदेशवाद और भाषावाद को बढ़ावा देकर महाराष्ट्र को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि हिंदी भाषियों के वोट से जीतने वाले कुछ जनप्रतिनिधि भी इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं या समर्थन कर रहे हैं।
अब्दुल गनी खान ने कहा, “हम मराठी भाषा और महाराष्ट्र की संस्कृति का सम्मान करते हैं, लेकिन जिस तरह की राजनीति की जा रही है, उससे समाज में विभाजन बढ़ सकता है और राज्य को नुकसान हो सकता है।”
मराठी अनिवार्यता के फैसले पर अब राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा और तूल पकड़ सकता है।

